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मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर लूटा, सनातन‍ियों ने बनाकर?

 मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर लूटा, सनातन‍ियों ने बनाकर?
ऐसी ही कुछ बातें देवदत्त पटनायक जी ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लिखकर पूरे सनातन धर्म को ही कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है।

ऐसी ही कुछ बातें देवदत्त पटनायक जी ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लिखकर पूरे सनातन धर्म को ही कठघरे में खड़ा करने का प्रयास किया है।

जहाँ तक मैं जनता हूँ उनके बारे में, वे सनातन धर्म के पुराणों की घटनाओं को अपने हिसाब से तोड़ मरोड़कर व्याख्या करके, किताबे लिखकर बेंचकर, और  विशेष धर्म का प्रचार करने वाले समझ में आते है। 

जिन मीडिया चैनल्स में जो वामपंथी विचारधारा से प्रेरित होते है, वे उन्हें सनातन धर्म पर PHD करने वाले डॉक्टर के रूप में बताते है, और जो भी उनसे प्रश्न पूछे जाते है, वो उसे अपनी दृष्टि खासकर वौद्ध धर्म विशेष स्थान देकर  उत्तर देते है। लेकिन व्याख्यान सनातन पर ही करेंगे। 

यहाँ में कुछ उनके द्वारा कही हुयी बातों को अपनी दृष्टि से बताने का प्रयन्त करूँगा।

मुगलों ने मंदिरों को तोड़कर लूटा, सनातन‍ियों ने बनाकर?

What I think? -

ये महाशय हमेशा बोलते है कि  एक मेरा सत्य और एक आपका सत्य।  तो ये मेरा सत्य है। 

सनातन धर्म न मुगलों के मंदिर तोड़ने से समाप्त हुआ, न लूटने वालों से, और न ही किसी लेखक की टिप्पणी से समाप्त होगा। सनातन अर्थात सत्य, और सत्य हमेशा सत्य ही रहेगा।

और ये महाशय चोरी को भी सत्य बता रहे है। ये इनका ज्ञान अर्थात ये इनका सत्य है, जो कि वास्तव में सत्य हो ही नहीं सकता। 

फिर आप आगे पढ़ेंगे तो वही घिसी पिटी वामपंथियों वाला रोना, जिसमे ब्राह्मणों को व्यापारी, या सेल्स और मंदिरो को लूट का स्थान आदि आदि। 

किसी भी बड़े धार्मिक स्थल पर भीड़ होती है। जहाँ भीड़ होती है, वहाँ व्यवस्था चाहिए। जहाँ व्यवस्था चाहिए, वहाँ भोजन, आवास, पार्किंग, प्रसाद, सुरक्षा, सफाई, परिवहन और अन्य सुविधाएँ भी चाहिए। इन सुविधाओं से एक अर्थव्यवस्था बनती है। लेकिन अर्थव्यवस्था बन जाने का अर्थ यह नहीं कि आस्था नकली हो गई, मंदिर लूट का स्थान हो गया और ब्राह्मण कर्म केवल  व्यापार है। 

वहाँ भोजन, आवास, पार्किंग, प्रसाद, सुरक्षा, सफाई, परिवहन नहीं होगा, और लोग कुचल कर मरेंगे तभी आपको ख़ुशी मिलेगी ? 

तो सोचिए आप क्या हैं?

और अगर आपको ब्राह्मण व्यापारी, और मंदिर लूट और व्यापार का स्थान दीखते है, तो क्या आप सनातन धर्म पर किताबें लिखकर फ्री में बाँट रहे है?  ये  व्यापार नहीं है? और यही कर्म कोई ब्राह्मण करता, तब क्या बोलते ?

अगर कोई व्यक्ति धर्म, पुराण और सनातन परंपरा की अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करके किताबें बेचता है, मंचों पर बोलता है और प्रसिद्धि पाता है, 

तो उसे मंदिरों की अर्थव्यवस्था पर प्रश्न उठाने से पहले अपने बौद्धिक व्यापार पर भी प्रश्न करना चाहिए।

क्या व्यवस्था होना अपराध है?

क्या अर्थव्यवस्था बन जाना लूट है?

क्या मंदिर के आसपास दुकानें होना आस्था को नकली बना देता है?

आपको ब्राह्मणों के हाथ में कैलकुलेटर ही दिखता है हमेशा? तो हर कोई जानना चाहेगा कि ब्राह्मणों से इतनी खीझ क्यों है? 

क्युकी शास्त्रों के अनुसार  भगवान् सबसे ज्यादा प्रेम और स्नेह ब्राह्मणो से ही करते है इसलिए ? 

फिर तो आपका  रूप सबके सामने फिर से आ गया। 

रही बात मंदिर में चोरी की तो जो लोग नौकरी करते थे, और जिन्होंने अपराध किया है उन्हें शास्त्रों के अनुसार  दंड सरकार या राजा देगा।  हाँ राजा दंड नहीं देता, कार्यवाही नहीं करता तो सनातनी अवश्य बोलता। 


लेकिन अंत में एक सत्य और बताता हूँ, जो कि मेरा सत्य है। 

पहली बार जब मैंने आपको टीवी पर 2018-19 के आसपास बोलते हुए देखा था, तो लगा था कि आज के समय में कोई सचमुच गहरा ज्ञानी व्यक्ति बोल रहा है। लेकिन अब आपकी ऐसी बातें देखकर पुरानी कहावत याद आती है — बाहरी चमक से स्वभाव नहीं बदलता।