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क्या सनातन धर्म में कोई कमी नहीं है? धर्म परिवर्तन क्यों ?

क्या सनातन धर्म में कोई कमी नहीं है? धर्म परिवर्तन क्यों ?
सनातन धर्म, धर्म परिवर्तन और छान्दोग्य उपनिषद् के संदर्भ में जानिए—समस्या धर्म में है या अपने ज्ञान और परंपरा से हमारी दूरी में?

अभी कुछ दिन पहले मैं और मेरा दोस्त भोलू किसी बात पर बात कर रहे थे, बात-बात में उसने मुझसे एक प्रश्न दाग दिया, यार तुम्हें क्या लगता है कि क्या सनातन धर्म में कोई कमी नहीं है? मुझे ऐसा क्यों लगता है कि सनातन समाज में धर्म परिवर्तन की घटनाएँ ज्यादा दिखाई देती हैं?

मैंने - देख भाई, बाकी धर्मों पर में कुछ नहीं बोल सकता है, लेकिन मैं सनातनी हूँ और अपना अनुभव अपने सनातन धर्म के बारे में स्पष्टता से बता सकता हूँ। 

इसके लिए मुझे  एक बात बताओ - छंद किसे कहते है?

उसने बोला - वर्णों या मात्राओं की नियमित संख्या, गति, यति, लय और तुक के नियमों से बंधी हुई रचना या श्लोक को छंद कहते हैं। 

मैंने कहा - बिल्कुल सही, लेकिन ये आधा सत्य है, दूसरा सत्य यह भी कि छान्दोग्य उपनिषद् में एक सुंदर प्रसंग आता है—देवता मृत्यु से भयभीत होकर त्रयी विद्या में प्रविष्ट हुए और छन्दों से स्वयं को आच्छादित किया। इसी प्रसंग में छन्द का संबंध ‘छादन’, अर्थात ढकने या आवरण देने, से बताया गया है।

भोलू - तो ?

मैंने कहा - अब इस बात को यहीं छोड़ते हैं, इसे बाद में पकड़ेंगे। 

मैंने आगे कहा - मैं एक व्यंग्यात्मक कहानी सुनाता हूँ। 

किसी मोहल्ले में एक परिवार रहता था, उस परिवार के मुखिया का नाम मनु था। उसके चार पुत्र हुए जिनका नाम शूद्र, वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण था। मनु के सभी पुत्रों को मोहल्ले में मनुष्य कहा जाता था।  मनु ने ये नाम उनके कर्म को देखकर रखे, जैसे कि उनका सबसे छोटा पुत्र शूद्र घर में सबसे छोटा था, वो घर के काम काज देखता था। वैश्य उससे बड़ा वो व्यापार में रुचि रखता था, क्षत्रिय पुत्र सेना में सैनिक था, और ब्राह्मण पुत्र खोजी टाइप का वैज्ञानिक था जो ज्ञान के माध्यम से सत्य की खोज या नए नए आविष्कार में लगा रहता था। 

भोलू - ये बात मैंने तुम्हारे पिछले ब्लॉग में पहले से पढ़ रखी है, आगे ? (Blog - शूद्र कौन होता है ?)

मैंने कहा - मैंने हँसकर कहा कि आगे की कहानी तुमको सुनी-सुनाई लगेगी। 

आगे कहा - मनु के घर के आसपास उसके पड़ोसी भी रहते थे।  वे मनु के घर की समृद्धि और कर्म के हिसाब से सभी बच्चों को खुशहाल देखकर उनका खाना नहीं पचता था।  एक दिन उसके एक पड़ोसी जिसका नाम आदमी था उसने देखा कि मनु का छोटा पुत्र शूद्र घर का पानी भर रहा है, और अपने पारिवारिक जीवन से खुश प्रतीत नहीं हो रहा । बस फिर क्या था, उस पड़ोसी आदमी को बहाना मिल गया, उसने शूद्र को आवाज़ दी, अरे भाई कुछ काम है क्या मेरी सहायता करोगे ?

फिर अपने घर बुलाकर शूद्र का ऐसे स्वागत किया जैसे किसी बहुत बड़े मेहमान का किया  जाता है, खूब आवभगत की। 

और धीरे-धीरे करके वह पड़ोसी उसे ये बातें भी बोलने लगा - बेटा! मुझे तुम्हारी दुर्दशा देखकर बड़ा बुरा लगता है, तुम दिन रात घर का काम करते रहते हो, और तेरा बड़ा भाई ब्राह्मण का देखो कैसा पेट बड़ा हो गया, बिना कोई काम करे, सबसे ज्यादा सेवा उसकी होती है, तुम उस घर में सेवक की तरह रहते हो।  उससे छोटा भाई क्षत्रिय वो भी अपने परिवार में खुश है, बढ़िया महीने की पगार में अच्छा जीवन जीता है, और अपनी शक्ति और पद की धौंस में रहता है। तीसरा भाई भी अपनी दुकान से बढ़िया जीवन जीता है, एक तुम्ही हो जो सबकी सेवा करते हो, और जो वो तुम्हें देते है उससे तुम्हें गुजारा करना पड़ता है। 

शूद्र बोला - जैसा मेरे पिता ने मेरे कर्म के अनुसार मेरा नाम और जीवन जीने का तरीका बताया है, उसमें गलत ही क्या है। जो मुझे पसंद है वो मैं करता हूँ, जो मेरे भाइयों को पसंद हैं, वह वे करते है। 

और तो और मेरे बड़े ब्राह्मण भैया ने मुझे बताया कि भगवान को प्राप्त करने के सबसे ज्यादा नियम उनके लिए है, उन्हें हर विधि विधान का पालन करना होता है। उससे आधे क्षत्रिय भाइयों को हैं, और उससे आधे मेरे वैश्य भाइयों को हैं, और मेरे लिए कोई नियम ही नहीं है। अर्थात मैं अपना कर्म करते हुए भगवान का स्मरण या नाम ले लूँ तो भी मेरा उद्धार हो जायेगा। 

आदमी ने सोचा, इसे तो ज्ञान है, क्या करूँ? उसने अपनी एक आंख बंद की, सिर खुजलाते हुए बोला। - मरने के बाद किसने देखा उद्धार-वुद्धार ? ये सब कुछ नहीं होता। बस जो दिख रहा है वही है, जो नहीं दिखता वैसा कुछ भी नहीं होता। 

मेरे पुत्रों आदमियों को देखो, वे जो मर्जी हो वो खा सकते है, जो स्त्री पसंद आती है उसे उठा लेते है, जो धनवान दिखता है उसे लूट लेते है, कोई नियम नहीं। नियम जानवरों के लिए होते हैं। हम आदमियों के लिए नहीं हैं। मुझे लगता है तुम मनुष्यों से तो हम आदमी लोग ही अच्छे है। 

तुम भी मनुष्यता छोड़ो और आदमी बन जाओ, फिर जो मर्जी हो वो करो। 

शूद्र ने बोला - नहीं मेरे पिता मनु ने जो मेरे लिए कर्म मेरे स्वभाव को देखकर निर्धारित किये है, वो मेरे जीवन को इस लोक और परलोक दोनों की प्राप्ति के लिए है, और मैं उसे नहीं छोड़ सकता। ये मेरा धर्म है। 

पड़ोसी आदमी अंदर से खिसियाकर बोला - ठीक है जैसी आपकी इच्छा। 

शूद्र वहां से उठकर तो आ गया, लेकिन उसके मन  बहुत से प्रश्न पैदा हो गए थे, और वो सीधा अपने बड़े भाई ब्राह्मण के पास गया, और उसे प्रणाम करके प्रश्न पूछे। उससे पूछा -

भैया हमारे पिता का नाम मनु है, इसलिए हमें मनुष्य कहा जाता है, और हमारे पिता देवताओं के वंश के है, तो हम भी देवताओं के वंशज है। क्या हमारे जैसे दिखने वाले जितने भी प्राणी है क्या वे सभी मनुष्य है ?

बड़ा भाई ब्राह्मण मुस्कुराया और बोला - आप बैठो पहले, मैं आपको इसके बारे में बताता हूँ। 

वह बोला, इस सृष्टि में सिर्फ देवताओं का ही स्थान नहीं है बल्कि हमारे जैसे दिखने वाले और भी है ? जैसे -

देवता — इन्द्र, वरुण, अग्नि, वायु, सूर्य आदि।

असुर / दैत्य / दानव — देवताओं के विरोधी माने जाने वाले अनेक कुल।

यक्ष — कुबेर से सम्बद्ध दिव्य प्राणी, धन और प्रकृति से जुड़े।

राक्षस — शक्तिशाली अलौकिक जाति; सभी राक्षस आवश्यक रूप से दुष्ट नहीं माने गए।

गन्धर्व — दिव्य संगीत, गायन और कलाओं से जुड़े।

अप्सराएँ — स्वर्ग की दिव्य नर्तकियाँ, जैसे उर्वशी, मेनका, रम्भा।

किन्नर — संगीत और दिव्य कलाओं से जुड़े अर्द्ध-दिव्य प्राणी।

नाग — सर्प-स्वरूप दिव्य जाति, जैसे शेष, वासुकि, तक्षक।

सिद्ध — सिद्धियाँ और उच्च आध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त दिव्य प्राणी।

चारण — देवताओं की स्तुति करने वाले दिव्य गायक/स्तुतिकर्ता।

विद्याधर — विशेष विद्याओं और अलौकिक शक्तियों वाले प्राणी।

पिशाच — भयावह या निम्नतर अलौकिक प्राणियों की श्रेणी।

भूत / प्रेत — मृत्यु के बाद की विशेष अवस्थाओं से संबंधित प्राणी।

गुह्यक — यक्षों से सम्बद्ध, विशेषतः कुबेर के अनुचर।

किम्पुरुष — पुराणों में वर्णित मानव-सदृश किंतु अलौकिक जाति।

पितृ — पूर्वजों की दिव्य श्रेणी, जिनका श्राद्ध आदि में उल्लेख होता है।


शूद्र - क्या ये सभी हमारे जैसे ही दिखते है?

ब्राह्मण - हाँ, लेकिन पूरी तरह से नहीं, इनके खान-पान, रंग, वेशभूषा, कला और कर्म में भिन्नता पाई जाती है। 

शूद्र (चौंककर) - फिर तो हमारी तरह इनके वंशज भी होंगे ?

ब्राह्मण - बिल्कुल, भैया। 

शूद्र - फिर ये अपना पड़ोसी आदमी किसका वंशज हो सकता है ?

ब्राह्मण — मेरे प्रिय अनुज, किसी मनुष्य के स्वभाव को समझना हो तो उसके आहार पर भी ध्यान दो। छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है कि अन्न का सूक्ष्मतम भाग मन को प्रभावित करता है — “अन्नमयं हि सोम्य मनः।” और यह भी कहा गया है — “आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः”, अर्थात आहार की शुद्धि से अन्तःकरण की शुद्धि होती है।

इसलिए भोजन केवल शरीर भरने की वस्तु नहीं है; उसका संबंध मन और प्रवृत्ति से भी है। अब यदि तुम देव, असुर, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व आदि के वर्णित आहार, स्वभाव और कर्मों का अध्ययन करके तुलना करना चाहो, तो वह चिंतन का विषय है, जो मैं करता हूँ, और मेरा कर्म है। लेकिन तुम चिंता मत करो, जब भी तुम्हारे मन में प्रश्न हो तो निसंकोच होकर पूछ लेना। 

मेरा मित्र भोलू इतना सुनकर बोला - भाई ये कहानी वास्तव में सुनी सुनी सी लग रही है, लेकिन क्या ये सत्य है ?

मैंने कहा - नहीं, ये कहानी सत्य नहीं है। लेकिन इस कहानी में छिपा हुआ सत्य उतना ही सत्य है जितना दूध को मथने में छिपा हुआ मक्खन। 

भोलू - प्रदीप भाई, जो आपने अपनी बात की शुरुआत में छंद को छोड़ा था, उसका क्या ?

मैंने बोला - बिल्कुल, अब हम उसी को फिर से पकड़ेंगे, और तुम्हारे प्रश्न " तुम्हें क्या लगता है कि क्या सनातन धर्म में कोई कमी नहीं है? मुझे ऐसा क्यों लगता है कि सनातन समाज में धर्म परिवर्तन की घटनाएँ ज्यादा दिखाई देती हैं?" का उत्तर दूंगा। 

मैंने कहा — छान्दोग्य उपनिषद् में बताया गया है कि मृत्यु से भयभीत देवताओं ने त्रयी विद्या का आश्रय लिया और स्वयं को छन्दों से आच्छादित किया। इसी प्रसंग में छन्द का संबंध छादन, अर्थात आवरण से बताया गया है।

अब मेरी पूरी बात समझो।

मेरे विचार से कमी सनातन के ज्ञान में नहीं, बल्कि उस ज्ञान से हमारी दूरी में है। मनु के जिन पुत्रों को मैंने इस कहानी में अलग-अलग कर्मों का प्रतीक बनाया, उनके बीच आपसी सम्मान, संवाद और ज्ञान का आदान-प्रदान समाप्त हो जाए, तो परिवार स्वयं कमजोर हो जाता है।

जब किसी व्यक्ति को अपने धर्म का अर्थ ही नहीं पता, अपने कर्म का उद्देश्य नहीं पता और अपने ही प्रश्नों का उत्तर अपने समाज से नहीं मिलता, तब कोई दूसरा व्यक्ति उसे अपनी बात आसानी से बरगलाकर उसे धर्म से भटका सकता है। और सोचिए जब राक्षस देवताओं के पीछे इस हिसाब से पड़े हैं तो क्या वंशज आज चुप बैठेंगे? चिंतन और मनन कीजिए। 

इसलिए मेरे अनुसार समस्या केवल धर्म परिवर्तन की नहीं है; मूल समस्या अपने ज्ञान से दूरी और आपसी विखंडन है।

भोलू बोला — अब समझ आया। शुरुआत में छोड़ी हुई छन्द वाली बात ही पूरी कहानी की चाबी थी।

मैं मुस्कराया — बस भाई, मेरा कहना इतना ही था। आप इससे सहमत हों या असहमत, लेकिन एक बार स्वयं पढ़िए, प्रश्न पूछिए और चिंतन जरूर कीजिए। जय श्री सीता राम।


डिस्क्लेमर — यह लेख एक काल्पनिक व्यंग्य-कथा और लेखक के व्यक्तिगत चिंतन पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी धर्म, जाति, समुदाय या व्यक्ति का अपमान करना नहीं है।

इस कहानी के पात्र किसी वर्तमान धर्म, जाति या समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते। ‘आदमी’, ‘मनु’, ‘ब्राह्मण’, ‘क्षत्रिय’, ‘वैश्य’ और ‘शूद्र’ यहाँ प्रतीकात्मक पात्र हैं, जिनके माध्यम से इतिहास और समाज में अलग-अलग समय पर दिखाई देने वाली कुछ मानवीय प्रवृत्तियों और विचारों पर व्यंग्यात्मक ढंग से चिंतन किया गया है।

क्या सनातन धर्म में कोई कमी नहीं है?


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