ससुर या सास के कोई पुत्र, नाती या पोता नहीं है तो वह अपनी लड़की और दामाद से अपने अंतिम संस्कार के साथ साथ पिंडदान करवाने के लिए संकल्प करवा सकता है
आज जब मैंने यह जानकारी, जो समाचार के रूप में AajTak की वेबसाइट पर प्रकाशित हुई है, देखी, तो मुझे लगा कि इस विषय पर कुछ आवश्यक स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए।
मुझे यह जानकारी कुछ हद तक अधूरी, संदर्भहीन और भ्रम पैदा करने वाली लगी।
आर्टिकल में छपे इस भाग को देखे -
1. अंतिम संस्कार का पारंपरिक नियम -
"अंतिम संस्कार का पारंपरिक नियम गरुड़ पुराण के अनुसार, अंतिम संस्कार का अधिकार आमतौर पर मृतक के सबसे निकट पुरुष सगे संबंधियों को दिया गया है, जैसे पुत्र, पोता या भाई. पहले के समय में केवल पुत्र को ही मुखाग्नि देने का अधिकार माना जाता था. यहां तक कि बेटियों को भी यह अधिकार नहीं दिया जाता था."
यहाँ भ्रम है -
पहले के समय में इनका अर्थ किस काल से है ये नहीं बताया ? अर्थात वर्षो पूर्व, शताब्दी, युग, कल्प या मन्वन्तर से पहले? और अगर आज के समय से पहले बेटियों द्वारा अंतिम संस्कार नहीं करवाया जाता था तो इसके लिए कोई कारण नहीं बताया ?
अंतिम संस्कार को पारंपरिक नियम बताना, तो क्या गरुड़ पुराण परंपरा है?
2. दामाद को लेकर क्या कहते हैं नियम?
"गरुड़ पुराण के अनुसार, जहां तक दामाद का सवाल है, तो परंपरागत रूप से उन्हें अंतिम संस्कार करने का अधिकार नहीं दिया गया, इसका मुख्य कारण सामाजिक और गोत्र संबंधी मान्यताएं हैं. हिंदू परंपरा में विवाह के बाद बेटी को पराया धन माना जाता था, और कन्यादान के बाद वह अपने पति के कुल और गोत्र से जुड़ जाती है. इस वजह से दामाद को मृतक के मूल परिवार का हिस्सा नहीं माना जाता था, और उन्हें इस धार्मिक कर्तव्य से दूर रखा जाता था."
यहाँ भ्रम है -
इस जानकारी को पहले गरुड़ पुराण के अनुसार बताना फिर इसका मुख्य कारण सामाजिक और गोत्र संबंधी मान्यताएं को बताना, तो श्रीगरुड़ पुराण क्या सामाजिक और मान्यताओ से भरा है?
यह प्रस्तुति गंभीर रूप से भ्रम पैदा करती है।
3. क्या दामाद अंतिम संस्कार कर सकता है?
"आज के समय में कई चीजें बदल रही हैं. यदि परिवार में पुत्र या अन्य निकट संबंधी मौजूद न हों, तो कई समुदायों और परिवारों में दामाद को अंतिम संस्कार करने की अनुमति दी जाती है. यह पूरी तरह से परिवार की सोच और परंपरा पर निर्भर करता है."
यहाँ भ्रम है -
अगर जानकारी गरुड़ पुराण पर आधारित है तो क्या इसे अन्य समुदाय अर्थात धर्म के लोग मानते है? तो फिर अन्य समुदाय के लोग क्या करते है उसे गरुड़ पुराण के अनुसार चलने वाले क्यों माने?
यहाँ शास्त्र और सामाजिक परंपरा को मिलाकर प्रस्तुत किया गया है।
4. बेटियों को क्यों नहीं दिया जाता था अधिकार?
"अंतिम संस्कार जैसी कठिन प्रक्रिया को देखना उनके लिए भावनात्मक रूप से कठिन हो सकता है. लेकिन समय के साथ यह सोच बदली है. आज कई बेटियां अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार स्वयं कर रही हैं और अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं."
5. बदलता समय और नई सोच
"आज बेटियां भी अपने माता-पिता की जिम्मेदारी निभा रही हैं. कई परिवारों में दामाद भी बेटे की तरह भूमिका निभाता है. ऐसे में इन पुराने नियमों पर पुनर्विचार करना जरूरी हो गया है."
ये 4,5 Points यह बड़ा भ्रम है। -
यहाँ बड़ा भ्रम पैदा होता है। “पुराने नियमों पर पुनर्विचार” जैसी बात लिखते समय यह स्पष्ट करना चाहिए कि बात शास्त्र की हो रही है, सामाजिक परंपरा की या आधुनिक विचार की।
जबकि सत्य क्या है ?
अगर लड़की का विवाह हो गया है तब -
अगर ससुर या सास के कोई पुत्र, नाती या पोता नहीं है तो वह अपनी लड़की और दामाद से अपने अंतिम संस्कार के साथ साथ पिंडदान करवाने के लिए संकल्प या वचन करवा सकता है, कि उसका अंतिम संस्कार दामाद के पुत्र अर्थात दोहित्र से करवाए, अगर पौत्र या नाती नहीं है तो दामाद भी कर सकता है लेकिन उससे जुड़े कर्म भी करने चाहिए।
जिसके बदले में वो अपनी प्रॉपर्टी या कुछ धन उसको देना होता है, तभी हिसाब बराबर होगा। अगर प्रॉपर्टी ले ली और अंतिम संस्कार नहीं किया तो वह क़र्ज़ हो जायेगा, जिसे वह अगले जन्म में चुकाना पड़ जायेगा, जो पितृदोष के रूप में भी कुंडली में दिख सकता है।
अगर लड़की का विवाह नहीं हुआ है तब -
तब वह अंतिम संस्कार कर सकती है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार जो भी नियम हो उसके अनुसार।
जिसकी जानकारी मुझे भी नहीं है। किसी वेदपाठी ब्राह्मण से सलाह लेकर ऐसा कार्य करना चाहिए।
पुराने नियमों पर पुनर्विचार करना जरूरी ?
ऐसा कभी भूल कर भी न करे, क्युकी भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है कि कही भी अपवाद या भ्रम या अज्ञान की स्थिति हो तब शास्त्रों का ज्ञान ही अंतिम उपदेश समझना चाहिए। न कि शास्त्रों को ही पुराना बताकर अधार्मिक कार्य करने के लिए प्रेरित करे।
अगर अपनी स्वेच्छा से स्वयं का निर्णय लेकर कोई कार्य करते है किसी मीडिया लेख को पढ़कर, तो मिलने वाले कर्म फल के जिम्मेदार भी स्वयं ही होंगे।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥ 24॥
(भगवद्गीता 16.24)
BG 16.24: इसलिए कार्य और अकार्य का निश्चय करने के लिए शास्त्रों में वर्णित विधानों को स्वीकार करो और शास्त्रों के निर्देशों को समझो तथा तदनुसार संसार में अपने कर्तव्यों का पालन करो।
सरल अर्थ: इसलिए, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए—इसका निर्णय करने में शास्त्र ही तुम्हारे लिए प्रमाण है। शास्त्र के विधान को जानकर ही तुम्हें कर्म करना चाहिए।
सनातन धर्म का अर्थ समझना चाहिए पहले तो -
सनातन धर्म, सनातन विज्ञान है जिसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्म का फल अवश्य मिलता है। अर्थात जैसा एक्शन होगा वैसा रिएक्शन मिलेगा। और इसमें भगवान् भी हस्तक्षेप नहीं करते है. यह बात कोई वेदपाठी ब्राह्मण या किसी भी जाति या वर्ण का साधक ही बता सकता है। सनातन धर्म में कोई भी जाति या वर्ण हेय नहीं है बल्कि सभी श्रेय है।
नोट: यह लेख किसी व्यक्ति या संस्था का अपमान करने के लिए नहीं है। उद्देश्य केवल यह है कि धार्मिक विषयों पर समाचार लिखते समय शास्त्रीय संदर्भ, अध्याय और श्लोक के साथ सही जानकारी दी जाए। यहाँ मेरा उद्देश्य किसी मीडिया संस्थान या व्यक्ति पर आक्षेप करना नहीं है। मेरा केवल इतना प्रयास है कि इस विषय को पौराणिक स्रोतों आधार पर सरल और स्पष्ट रूप में रखा जाए, ताकि पाठक भ्रमित न हों।
समस्या यह नहीं कि दामाद या बेटी कर सकते हैं या नहीं। समस्या यह है कि बिना श्लोक-संदर्भ के किसी सामाजिक परंपरा को गरुड़ पुराण का नियम बताकर प्रस्तुत किया जा रहा है।
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