आजकल शहरों में कुत्तों के काटने की घटनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। गली-मोहल्लों, बाजारों, पार्कों और सार्वजनिक जगहों पर अक्सर ऐसी खबरें सुनने को मिल जाती
आपने भी देखा होगा कि आजकल शहरों में कुत्तों के काटने की घटनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। गली-मोहल्लों, बाजारों, पार्कों और सार्वजनिक जगहों पर अक्सर ऐसी खबरें सुनने को मिल जाती हैं कि किसी कुत्ते ने बच्चे, बुजुर्ग या राह चलते व्यक्ति को काट लिया।
हाल ही में जब देश में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों को खाना खिलाने और आवारा कुत्तों से जुड़ी बातों पर चर्चा हुई, तब मेरे मन में एक सवाल उठा—जो कुत्ता कभी मनुष्य का सबसे बड़ा साथी माना जाता था, वही आज मनुष्य को काटने क्यों लगा है?
कुत्ता मनुष्य का साथी आज से नहीं, बल्कि युगों-युगों से रहा है। हमारे धर्म और इतिहास में भी कुत्ते को निष्ठा, साथ और सुरक्षा का प्रतीक माना गया है। महाभारत में जब पांडवों ने जीवन के अंतिम समय में हिमालय की ओर प्रस्थान किया, तब एक कुत्ता भी उनके साथ चला। अंत में जब युधिष्ठिर अकेले बचे और उन्हें लेने के लिए देवताओं का विमान आया, तब युधिष्ठिर ने उस कुत्ते को छोड़े बिना स्वर्ग जाने से मना कर दिया। यह घटना बताती है कि भारतीय परंपरा में कुत्ते का स्थान कितना महत्वपूर्ण रहा है।
फिर सवाल यह है कि वही कुत्ता आज कई जगहों पर डर का कारण क्यों बन रहा है? क्या कुत्ता बदल गया है, या इंसान का व्यवहार बदल गया है?
मैं भी एक साधारण मनुष्य हूँ और मेरे भी कुत्तों के साथ कुछ अनुभव रहे हैं। उन्हीं अनुभवों को आज आपके साथ साझा कर रहा हूँ।
मेरा अनुभव – 1
मुझे अपने मोहल्ले के कुत्तों से बहुत लगाव रहा है। आज भी है। हमारे मोहल्ले में एक सफेद रंग का कुत्ता था, जो मुझे बहुत पसंद था। वह शांत स्वभाव का था और अक्सर गली में दिख जाता था।
एक दिन मैंने देखा कि उसके मुँह से लेकर गले तक लाल रंग लगा हुआ था। वह चुपचाप बैठा सबको घूर रहा था। आसपास के लोगों ने बताया कि उसने कहीं पड़ी हुई मरी हुई भैंस का मांस खा लिया है, इसलिए वह “पागल” हो गया है। लोग उससे दूर रहने लगे। कुछ ही दिनों बाद वह कुत्ता मर गया।
उस दिन मुझे पहली बार महसूस हुआ कि सड़क पर रहने वाले कुत्तों की जिंदगी कितनी कठिन होती है। वे क्या खाते हैं, कहाँ सोते हैं, बीमार होने पर उनका इलाज कौन कराता है—इन बातों पर शायद ही कोई ध्यान देता है।
मेरा अनुभव – 2
मेरे एक दोस्त ने एक छोटा-सा पिल्ला पाला था। वह बहुत प्यारा था और मुझे भी बहुत अच्छा लगता था। एक दिन मैं उसके घर गया तो देखा कि उसका छोटा भाई उस पिल्ले के साथ खेल रहा था। लेकिन वह खेल कम और उसे परेशान ज्यादा कर रहा था।
कभी उसकी पूँछ पकड़ता, कभी उसे थप्पड़ मारता, कभी डराता। पिल्ला भौंकता तो घर के लोग हँसते। मैंने उसी समय कहा—
“भाई, ऐसे मत करो। यह धीरे-धीरे चिड़चिड़ा हो जाएगा और बाद में काटने लगेगा।”
उन्होंने कहा—
“नहीं, यह हमारा पिल्लू है। बहुत समझदार है। हमारी सारी बात मानता है।”
मैं चुप हो गया। लेकिन लगभग एक महीने बाद सुनने में आया कि वही पिल्ला घर के लोगों को काटने लगा है। वह हर चीज से चिढ़ने लगा था। बाद में उन्होंने उसका मुँह पकड़कर उसे घर से लगभग 100 किलोमीटर दूर कहीं छोड़ दिया। घर के लोगों को इंजेक्शन लगवाने पड़े।
यह घटना मेरे मन में आज तक बैठी हुई है। गलती किसकी थी? उस पिल्ले की, या उन लोगों की जिन्होंने उसे प्यार के नाम पर रोज परेशान किया?
मेरा अनुभव – 3
मैं जब कभी गोलगप्पे खाने बाजार जाता हूँ, तो वहाँ पास में चिकन रोस्ट का एक ठेला भी लगता है। वहाँ कई ग्राहक चिकन खाने के बाद हड्डियाँ कुत्तों की ओर फेंक देते हैं। कई बार ऐसा लगता है जैसे इंसान किसी जीव को खाकर उसकी हड्डियाँ दूसरे जीव को देकर अपना हिसाब बराबर कर रहा हो।
एक दिन जब मैं वहाँ गया तो पता चला कि वहाँ हड्डियाँ खाने के लिए आने वाले कुत्तों में से एक कुत्ता बहुत आक्रामक हो गया है और उसने कई लोगों को काट लिया।
मैंने गोलगप्पे वाले से पूछा— “यह कुत्ता ऐसा कैसे हो गया?”
उसने कहा— “यह यहाँ रोज हड्डियाँ और बचा हुआ मांस खाता था। उस दिन शायद ज्यादा खा गया, इसलिए पागल हो गया।”
मैंने पूछा— “क्या ज्यादा मांस खाने से कुत्ते पागल हो जाते हैं?”
उसने कहा— “हाँ, ज्यादा मांस खाने से कुत्ते पागल हो जाते हैं।”
मैंने उससे कहा— “अगर ऐसा है, तो यह गलती तो शहर के बहुत से लोग करते हैं। जो लोग सड़क पर हड्डियाँ, बचा हुआ मांस या खराब खाना फेंकते हैं, वे भी तो जिम्मेदार हुए?”
उसने जवाब दिया— “तो कुत्ते उन्हें काटेंगे नहीं तो क्या करेंगे?”
मेने सोचा — “इसका मतलब ये हुआ कि ये कुत्तों को हड्डी डालने वाले लोग अपने ही नाम की सुपारी दे रहे है ? वो भी किश्तों में !!”
क्या सच में कुत्ते “पागल” हो रहे हैं?
आम बोलचाल में लोग हर आक्रामक कुत्ते को “पागल” कह देते हैं, लेकिन हर काटने वाला कुत्ता पागल नहीं होता। कई बार कुत्ता डर के कारण काटता है, कई बार भूख के कारण, कई बार दर्द या बीमारी के कारण, और कई बार इंसानों द्वारा सताए जाने के कारण।
असली समस्या कहाँ है?
समस्या सिर्फ कुत्तों में नहीं है। समस्या हमारे व्यवहार में भी है।
हम कभी उन्हें प्यार के नाम पर परेशान करते हैं।
कभी खाना खिलाकर अपनी जिम्मेदारी समझ लेते हैं, लेकिन इलाज, नसबंदी और टीकाकरण की चिंता नहीं करते।
कभी उन्हें पत्थर मारते हैं।
कभी छोटे बच्चे उन्हें खेल-खेल में सताते हैं।
कभी खराब खाना, हड्डियाँ और कचरा फेंककर उन्हें बीमार बना देते हैं।
और जब वही कुत्ता डर, भूख या दर्द में काट लेता है, तो हम उसे “पागल” कह देते हैं।
समाधान क्या हो सकता है?
कुत्तों की समस्या का समाधान न तो केवल उन्हें भगाने में है और न ही केवल खाना खिलाने में। समाधान संतुलन में है।
आवारा कुत्तों की नियमित नसबंदी होनी चाहिए।
रेबीज टीकाकरण होना चाहिए।
सार्वजनिक स्थानों पर जिम्मेदारी से खाना खिलाने की व्यवस्था होनी चाहिए।
बच्चों को सिखाना चाहिए कि जानवरों को परेशान न करें।
बीमार या आक्रामक कुत्तों की सूचना तुरंत संबंधित विभाग को देनी चाहिए।
और सबसे जरूरी बात—जानवरों के साथ दया भी होनी चाहिए और अनुशासन भी।
अंत में
कुत्ता आज भी मनुष्य का साथी है। वह जन्म से दुश्मन नहीं होता। लेकिन अगर वह भूखा है, बीमार है, डराया गया है, सताया गया है या गलत माहौल में पल रहा है, तो उसका व्यवहार बदल सकता है।
आज जरूरत है कि हम यह सोचें—क्या सच में कुत्ते पागल हो रहे हैं, या इंसान ने उनके साथ अपना व्यवहार बदल दिया है?
जो कुत्ता कभी घर, गली और समाज का रक्षक माना जाता था, वही आज कई जगह डर का कारण बन रहा है। यह केवल कुत्तों की समस्या नहीं, बल्कि इंसान और समाज के बदलते व्यवहार की भी कहानी है।
आप क्या सोचते हैं?
गलती कुत्तों की है, इंसानों की है, या हमारी व्यवस्था की? अपनी राय कमेंट में जरूर लिखें।

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